मुंगेली में ‘स्वाद’ के साथ परोसी जा रही ‘मौत’: अखबार की स्याही बनी धीमा जहर, सोया है प्रशासन
जो फ़ोटो आपको दिखाई दे रही वह मुंगेली के पड़ाव चौक स्थित दुकान की हैं, समोसे में स्याही और अखबार छपे जैसा हो गया हैं जिसे खाने से गंभीर बीमारी को न्योता देना हैं।
मुंगेली/ शहर के होटलों और ठेलों पर इन दिनों जायके के साथ ‘बीमारियां’ परोसी जा रही हैं। एक ओर जहां आम जनता अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूक हो रही है, वहीं दूसरी ओर मुंगेली का खाद्य एवं सुरक्षा विभाग गहरी नींद में सोया हुआ है। होटलों में धड़ल्ले से अखबारों का उपयोग खाद्य सामग्री रखने और लपेटने के लिए किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर इंसानी जान से खिलवाड़ है।
अखबार की स्याही – स्वाद नहीं, मौत का सामान…
चिकित्सा विशेषज्ञों और विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि अखबार छापने में इस्तेमाल होने वाली स्याही (Ink) में घातक रसायन और लेड (Lead) होते हैं। जब गर्म समोसे, कचौड़ी, पोहा, जलेबी या अन्य तैलीय पदार्थ अखबार पर रखे जाते हैं, तो यह स्याही भोजन में मिल जाती है। इसका सेवन करने से पाचन तंत्र खराब होने से लेकर कैंसर जैसी कई जानलेवा बीमारियां होने का खतरा बना रहता है। बावजूद इसके मुंगेली के बड़े-छोटे होटलों और ठेलों में यह जानलेवा खेल जारी है।
विभाग की ‘कुंभकर्णी’ नींद और कागजी व निरीक्षण केवल खानापूर्ति…
हैरानी की बात यह है कि शहर में जिम्मेदार विभाग की नाक के नीचे यह सब हो रहा है, लेकिन खाद्य एवं सुरक्षा विभाग मौन साधे बैठा है। ऐसा लगता है कि विभाग को किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार है। समय-समय पर निरीक्षण और सैंपलिंग की खानापूर्ति तो की जाती है, साथ ही समझाईश भी दी जाती हैं लेकिन धरातल पर कड़े प्रतिबंध और कार्यवाही का अभाव साफ नजर आता है। होटलों की साफ-सफाई और मानकों की लगातार जांच न होना विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता हैं ?
जनता को होना पड़ेगा जागरूक…तत्काल टोके…
शहर में कुछ गिने चुने जागरूक नागरिक अब होटलों में अखबार के इस्तेमाल का विरोध करने लगे हैं, लेकिन होटल व्यवसायियों की मनमानी और प्रशासन के ढुलमुल रवैये के कारण सुधार नहीं दिख रहा है।
बड़ा सवाल यह हैं कि क्या मुंगेली का प्रशासन केवल कागजों पर ही स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगा ? आखिर कब तक रसूखदार होटल व्यवसायियों को खुली छूट मिलती रहेगी और आम जनता के स्वास्थ्य को दांव पर लगाया जाता रहेगा ?
अब देखना हैं कि जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारी कितने सक्रिय दिखते हैं ?

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