October 19, 2026

भ्रष्टाचार और ‘कमीशनखोरी’ की भेंट चढ़ती जनहितैषी योजनाएं, सिस्टम की सुस्ती से जनता बेहाल

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मुंगेली। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ी खाई नजर आ रही है। जिले के लगभग 40 विभागों में संचालित योजनाएं भ्रष्टाचार और लापरवाही के दलदल में फंस गई हैं। आलम यह है कि आम जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि जिम्मेदार तंत्र मौन साधे बैठा है।


विभागों का हाल: कहीं जर्जर भवन, कहीं दवाओं का अभाव
जिले के प्रमुख विभागों की स्थिति पर नजर डालें तो आंकड़े और हकीकत डराने वाले हैं:


स्वास्थ्य विभाग: अस्पतालों की हालत खस्ता है। न डॉक्टर पर्याप्त हैं और न दवाइयां। इमरजेंसी सेवाओं के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में है।


शिक्षा का गिरता स्तर: स्कूलों में संसाधनों की कमी और जर्जर भवन बच्चों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। कई जगह शिक्षक न होने से पढ़ाई ठप है।
नगर निकाय व पंचायतें: यहां विकास कार्य केवल कागजों तक सीमित हैं। धरातल पर हो रहे कार्यों की गुणवत्ता इतनी निम्न है कि वे पहली बारिश भी नहीं झेल पा रहे।
जनप्रतिनिधि: जनसेवा से ज्यादा ‘कमीशन’ में रुचि?
स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश है। जनता का सीधा आरोप है कि जिन जनप्रतिनिधियों को उनकी आवाज बुलंद करनी थी, वे अब ठेकेदारों और अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर ‘कमीशन के खेल’ में व्यस्त हैं। चुनाव के वक्त किए गए वादे फाइलों में दबे हैं और अधिकारी बेलगाम हो चुके हैं।


“पत्रकारिता पर भी उठे सवाल: मिशन की जगह ‘मैनेजमेंट’ हावी”
जिले में पत्रकारिता का गिरता स्तर सबसे दुखद पहलू बनकर उभरा है। सूत्रों की मानें तो पत्रकारिता का एक वर्ग अब जनहित के मुद्दों को उठाने के बजाय अधिकारियों और व्यापारियों से ‘मैनेजमेंट’ करने में जुटा है। व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए खबरों को दबाने के खेल ने पत्रकारिता की साख पर बट्टा लगाया है।


कौन बनेगा मुंगेली की आवाज?
हालांकि, इस अंधेरे के बीच कुछ जागरूक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अब भी सच की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन भ्रष्टाचार का तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि ये कोशिशें नाकाफी साबित हो रही हैं।


निष्कर्ष:
मुंगेली को विकास की पटरी पर वापस लाने के लिए जनप्रतिनिधियों को अपनी जवाबदेही समझनी होगी और पत्रकारों को अपनी लेखनी की धार पुनः जनहित की ओर मोड़नी होगी। यदि ‘मैनेजमेंट’ का यह दौर नहीं थमा, तो लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा।

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