गंदे नालों ने छीनी आगर नदी की सांसें,अस्तित्व बचाने को जूझ रही जीवनदायिनी धारा,ठोस कदम उठाने आमजन ने शासन से कर रहे है अपील
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मुंगेली/नगर के बीचों-बीच बहने वाली आगर नदी इन दिनों गंभीर प्रदूषण की चपेट में है। कभी नगर और आसपास के ग्रामीण इलाकों की जीवनरेखा मानी जाने वाली यह नदी आज अपने अस्तित्व को बचाने की जंग लड़ रही है। नगर के कई नालों का गंदा पानी सीधे नदी में गिरने से इसका जल लगातार दूषित होता जा रहा है। हालत यह है कि कई स्थानों पर आगर नदी अब नदी कम और गंदे नाले जैसी अधिक नजर आने लगी है। दूषित पानी,उठती बदबू,तैरता कचरा और झाग नदी की बिगड़ती सेहत की कहानी खुद बयां कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शहर का गंदा पानी लगातार आगर नदी में छोड़ा जा रहा है,जिससे न केवल नदी का प्राकृतिक स्वरूप नष्ट हो रहा है,बल्कि आसपास का वातावरण भी प्रभावित हो रहा है। नदी के किनारे रहने वाले नागरिक बताते हैं कि पानी का रंग बदल चुका है और उससे तेज दुर्गंध आती है। कई जगहों पर प्लास्टिक,घरेलू कचरा,गंदगी और सड़ी-गली सामग्री पानी में तैरती दिखाई देती है। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि नदी किनारे खड़ा होना भी मुश्किल लगने लगा है।
नगर के बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय आगर नदी का पानी साफ,स्वच्छ और उपयोगी हुआ करता था। लोग इसके जल का इस्तेमाल आम निस्तारी,घरेलू जरूरतों और पशुओं के लिए करते थे। बरसात के दिनों में नदी पूरे सौंदर्य के साथ बहती थी और आसपास के क्षेत्र की हरियाली भी इससे जुड़ी हुई थी। आगर नदी केवल जलधारा नहीं थी,बल्कि नगर की संस्कृति,आस्था और जीवन का केंद्र थी। महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु पहले नदी में स्नान करते थे और उसके बाद खर्राघाट स्थित शिव मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए जाते थे। इसी तट पर लगने वाला मेला नगर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
आज भी आगर नदी का धार्मिक महत्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। पुलपारा स्थित घाट पर दीपावली के बाद छठ पर्व के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं और डूबते तथा उगते सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं। यह दृश्य बताता है कि नदी अब भी लोगों की धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़ी हुई है। विडंबना यह है कि जिस नदी को लोग पूजते हैं,उसी की स्वच्छता और संरक्षण को लेकर शासन प्रशासन के द्वारा अपेक्षित गंभीरता नजर नहीं आती।
स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों का आरोप है कि नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए अब तक कोई ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है। कई बार शिकायतें और मांगें उठने के बावजूद जिम्मेदार विभागों की ओर से केवल औपचारिकता निभाई जाती रही है। सफाई अभियान,जल निकासी व्यवस्था और नदी संरक्षण की योजनाओं की बातें तो होती हैं,लेकिन धरातल पर हालात जस के तस बने हुए हैं। नगरवासियों का कहना है कि यदि समय रहते सीवेज और नालों के गंदे पानी को नदी में गिरने से नहीं रोका गया,तो आने वाले वर्षों में आगर नदी का अस्तित्व गंभीर संकट में पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार,किसी भी नदी में लगातार सीवर और गंदे नालों का पानी मिलने से जल की गुणवत्ता तेजी से गिरती है। इससे पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है,जिसका सीधा असर जलजीवों पर पड़ता है। प्रदूषित पानी न केवल नदी की जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि इससे खेत,पशु और मानव स्वास्थ्य भी प्रभावित होते हैं। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने पर नदी का प्राकृतिक पुनर्जीवन भी कठिन हो जाता है।
नदियों के संरक्षण को लेकर केंद्र सरकार और देश का सर्वोच्च न्यायालय भी समय-समय पर गंभीर चिंता जता चुके हैं। विभिन्न योजनाओं के माध्यम से नदियों को प्रदूषणमुक्त बनाने,सीवेज के सीधे प्रवाह को रोकने और जल स्रोतों के संरक्षण पर जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट भी अनेक मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि नदियां देश की प्राकृतिक धरोहर हैं और उन्हें स्वच्छ रखना सरकार तथा समाज दोनों की साझा जिम्मेदारी है। इसके बावजूद यदि स्थानीय स्तर पर ठोस कदम नहीं उठते,तो ऐसी योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं।
आगर नदी की वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि अब केवल सरकारी प्रयासों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए जनभागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। स्थानीय समाजसेवियों ने मांग की है कि नदी में गिर रहे गंदे पानी को तत्काल रोका जाए,नालों के लिए अलग निकासी व्यवस्था विकसित की जाए,नियमित सफाई अभियान चलाया जाए,नदी किनारे अतिक्रमण और कचरा फेंकने वालों पर सख्त कार्रवाई हो,तथा लोगों में नदी संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए। उनका कहना है कि यदि नगरवासी, जनप्रतिनिधि और प्रशासन एकजुट होकर प्रयास करें,तो आगर नदी को फिर से स्वच्छ,सुंदर और निर्मल बनाया जा सकता है।
नगरवासियों का मानना है कि अगर अब भी समय रहते प्रयास नहीं किए गए,तो आगर नदी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगी। जो नदी कभी जीवन,आस्था और संस्कृति की प्रतीक थी,वह आने वाले समय में केवल स्मृतियों का हिस्सा बन सकती है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि शासन-प्रशासन,जनप्रतिनिधि,सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर इस अमूल्य प्राकृतिक धरोहर को बचाने की दिशा में ठोस,प्रभावी और स्थायी पहल करें।




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