October 19, 2026

अपोलो हॉस्पिटल के चार डॉक्टरों को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने एफआईआर और चार्जशीट की कार्यवाही की निरस्त

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7 साल पुराने मामले में आया फैसला, कोर्ट ने कहा – लापरवाही का कोई ठोस प्रमाण नहीं

बिलासपुर । छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में अपोलो हॉस्पिटल के चार डॉक्टरों — डॉ. सुनील कुमार केडिया, डॉ. देवेंद्र सिंह, डॉ. राजीव लोचन भांजा और डॉ. मनोज कुमार राय — को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और निचली अदालत में दाखिल चार्जशीट को निरस्त कर दिया है। यह मामला वर्ष 2016 में एक मरीज की मृत्यु से संबंधित था, जिसमें डॉक्टरों पर उपचार में लापरवाही के आरोप लगाए गए थे। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य और मेडिकल रिपोर्ट से यह साबित नहीं होता कि डॉक्टरों की ओर से कोई आपराधिक लापरवाही हुई है।

घटना का विवरण

दयालबंद निवासी एक युवक को 25 दिसंबर 2016 को गंभीर हालत में अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। मरीज का मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर के कारण अगले दिन 26 दिसंबर को निधन हो गया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर में किसी भी जहरीले पदार्थ, जैसे सल्फास, के अवशेष नहीं पाए गए। इसके बावजूद परिजनों की शिकायत पर सरकंडा थाना में डॉक्टरों के खिलाफ आईपीसी की धारा 304A (गैरइरादतन हत्या) और धारा 201 (सबूत मिटाने) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

मेडिकल बोर्ड ने दी थी क्लीन चिट

डॉक्टरों की ओर से सीनियर एडवोकेट सुनील ओटवानी ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सिम्स और राज्य मेडिकल बोर्ड की दो अलग-अलग रिपोर्टों में यह स्पष्ट कहा गया था कि डॉक्टरों की ओर से किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं हुई।
राज्य मेडिकल बोर्ड, जिसमें पांच विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल थे, ने वर्ष 2023 में अपनी रिपोर्ट में कहा कि उपचार प्रक्रिया पूरी तरह चिकित्सकीय मानकों के अनुसार थी।

पुलिस रिपोर्ट पर दर्ज हुआ था केस

इसके बावजूद पुलिस ने अपने मेडिको लीगल विशेषज्ञ की रिपोर्ट के आधार पर केस दर्ज किया। इस रिपोर्ट में यह कहा गया कि मृत्युपूर्व बयान रिकॉर्ड नहीं किया गया और राइस ट्यूब को संरक्षित नहीं किया गया, परंतु यह नहीं बताया गया कि इन तथ्यों का मरीज की मृत्यु से कोई प्रत्यक्ष संबंध था।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड द्वारा किसी लापरवाही का निष्कर्ष नहीं निकाला गया, तब ऐसे में डॉक्टरों पर आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि “मामले में आपराधिक लापरवाही का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, इसलिए एफआईआर और चार्जशीट को निरस्त किया जाता है।” इस निर्णय से चिकित्सक वर्ग में राहत की भावना देखी जा रही है, जिसे मेडिकल जगत में एक माइलस्टोन फैसला माना जा रहा है।

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