मुंगेली में 6000 वर्गफीट के निर्माण पर सवाल, भवन अनुज्ञा निरस्त फिर भी काम जारी होने का आरोप
जीवन मंगलानी, बरखा मंगलानी और पूनम मंगलानी से जुड़े निर्माण का मामला;
नगर पालिका की अनुमति प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल, जिला प्रशासन से जांच की मांग
अरुण साव के गृहजिले में अवैध प्लाटिंग में अवैध निर्माण को जबरदस्त बढ़ावा…CMO, इंजीनियर की चालाकी…नगर पालिका का कारनामा…पहले भवन अनुज्ञा जारी, फिर निरस्त…फिर भी युद्ध स्तर में कार्य जारी
6000 वर्गफीट की दो भूमि पर जारी भवन निर्माण अनुमतियां निरस्त, लेकिन आगे की कार्रवाई को लेकर स्पष्टता नहीं…
जीवन मंगलानी, बरखा मंगलानी और पूनम मंगलानी द्वारा किया जा रहा बड़े पैमाने में अवैध निर्माण…
मुंगेली/ नगर पालिका परिषद मुंगेली की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पहले भवन निर्माण की अनुमति जारी करना और फिर कुछ ही महीनों में उन्हीं अनुमतियों को निरस्त कर देना, और निरस्त के बाद भी अवैध निर्माण जारी रहना। आखिर किस तरह की जांच प्रक्रिया की ओर इशारा करता है ? दो अलग-अलग भूखंडों पर 3000-3000 वर्गफीट भूमि के लिए जारी भवन निर्माण अनुज्ञाएं निरस्त किए जाने के बाद अब मामला जमीन के स्वामित्व, अवैध प्लॉटिंग की सूची और सीमांकन के दावों के बीच उलझ गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नगर पालिका ने अनुमति निरस्त कर दी, तो उसके बाद संबंधित स्थलों पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए ठोस कार्रवाही क्यों नहीं की जा रही। अभी भी अवैध निर्माण किसकी शह पर हो रहा हैं, सीएमओ इंजीनियर सहित राजस्व अमला मूकदर्शक क्यों बना हुआ हैं ?
नगर पालिका के उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, भवन निर्माण अनुज्ञा क्रमांक 2026-25-000029 और 2026-25-000030, दोनों 17 मार्च 2026 को जारी की गई थीं। इसके बाद जून 2026 में दोनों अनुज्ञाएं निरस्त करने की सूचनाएं जारी की गईं। पहली सूचना क्रमांक 930, दिनांक 3 जून 2026 की है, जबकि दूसरी सूचना क्रमांक 931 के माध्यम से दूसरी अनुज्ञा निरस्त किए जाने का उल्लेख है।
यहां सवाल सिर्फ दो अनुमतियां निरस्त करने का नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया का है जिसमें पहले निर्माण की अनुमति दी गई, बाद में शर्तों के उल्लंघन का हवाला देकर उसे रद्द किया गया, लेकिन अभी भी अवैध निर्माण जारी हैं और अब संबंधित पक्ष के पुनः आवेदन पर राजस्व विभाग की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, या यूं कहें कि अवैध निर्माण करने वालों को अवैध निर्माण करने समय दिया जा रहा हैं, आखिर इस पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी बनती है ?
पहले अनुमति कैसे मिली, बाद में निरस्त क्यों करनी पड़ी ?
नगर पालिका के दस्तावेजों में दोनों भवन निर्माण अनुज्ञाओं के निरस्तीकरण के पीछे अनुमति की शर्त क्रमांक 1 का पालन नहीं होने तथा शर्त क्रमांक 11 के अधीन उल्लंघन का उल्लेख है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब अनुमति जारी की गई थी, तब संबंधित भूखंडों के दस्तावेजों, निर्माण संबंधी शर्तों और भूमि की स्थिति की जांच किस आधार पर की गई थी ?
यदि अनुमति जारी होने के बाद नियमों के उल्लंघन का पता चला, तो यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि उल्लंघन किस प्रकार का था और उसे पकड़ने में कितना समय लगा। क्या अनुमति जारी करने से पहले सभी जरूरी तथ्यों का सत्यापन किया गया था, या फिर बाद में सामने आई परिस्थितियों के कारण कार्रवाई करनी पड़ी ?
नगर पालिका प्रशासन को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। क्योंकि अनुमति जारी करने से लेकर उसे निरस्त करने तक की पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही संबंधित विभागीय व्यवस्था पर ही आती है।
निरस्तीकरण का आदेश जारी, अब जमीन पर कार्रवाई कहां ? निर्माण अब भी युद्ध स्तर पर जारी…
किसी भवन निर्माण अनुज्ञा को निरस्त करना प्रशासनिक कार्रवाई का एक हिस्सा है। लेकिन उसके बाद मौके पर क्या स्थिति है, यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि अनुमति निरस्त होने के बावजूद संबंधित स्थल पर निर्माण जारी है, तो सवाल उठना लाजिमी है कि नगर पालिका ने निर्माण की निगरानी और नियमों के पालन के लिए क्या कदम उठाए ? जानकारी मिली हैं कि इस मामले में राजस्व विभाग, एसडीएम से गाइडलाइंस मांगा गया हैं, जबकि जिस स्थान में अवैध निर्माण हो रहा हैं वह अवैध प्लाटिंग का ही हिस्सा हैं जिस खसरे नम्बर को एसडीएम ने स्वयं अपने पत्र में अवैध कालोनी बताया हैं। अब जब एसडीएम ने इस जमीन को अवैध प्लाटिंग का हिस्सा आरआई पटवारी के प्रतिवेदन के आधार पर बताया तो नगर पालिका किस हिसाब से उनसे गाईडलाईन मांग रही हैं ऐसे में लोगों का कहना हैं कि नगर पालिका एसडीएम को बलि का बकरा बना अपना पल्ला झाड़ने की साजिश रच रही हैं।
नगर पालिका के अधिकारियों पर गैरकानूनी कार्य करने के आरोप….चुप्पी से और शक…
नगर पालिका ने अवैध प्लाटिंग में NOC दिया, फिर निरस्त किया, और अभी भी अवैध निर्माण नहीं रूकवाया जा रहा। क्या संबंधित स्थलों का निरीक्षण कराया गया ? क्या निर्माण की वर्तमान स्थिति का प्रतिवेदन तैयार हुआ ? क्या संबंधित पक्ष को आगे निर्माण नहीं करने के संबंध में कोई निर्देश दिया गया ? यदि निर्माण जारी पाया गया, तो नियमानुसार कार्रवाई क्यों और किस स्तर पर की गई ? नोटिस के बाद भी निर्माण कार्य चलना CMO इंजीनियर की कार्यशैली में प्रश्नचिन्ह लगाता हैं ? नगर पालिका को स्वयं मौके की स्थिति अब स्पष्ट करनी चाहिए।
सीएमओ का जवाब—पुनः आवेदन आया, उच्च राजस्व अधिकारी को भेजा…
इस पूरे मामले में नगर पालिका परिषद मुंगेली के सीएमओ होरी सिंह ठाकुर ने बताया कि संबंधित भवन निर्माण अनुज्ञा निरस्त की गई थी। इसके बाद संबंधित पक्ष ने दोबारा आवेदन प्रस्तुत किया है।
सीएमओ के अनुसार, संबंधित पक्ष ने आवेदन में तर्क दिया है कि पीछे स्थित मकान के लिए कुछ वर्ष पहले भवन निर्माण अनुज्ञा जारी की गई थी। साथ ही मुख्य मार्ग की जमीन होने का हवाला देते हुए भूमि को अवैध प्लॉटिंग की सूची से हटाने की मांग की गई है।
सीएमओ ने बताया कि आवेदन को उच्च राजस्व अधिकारी के पास भेजा गया है। उनके बयान में सरकारी जमीन और एसएनजी कॉलेज की जमीन का विषय भी सामने आया है। संबंधित पक्ष अपने दावे के समर्थन में सीमांकन करा सकता है।
सीएमओ का यह जवाब मामले को और गंभीर प्रशासनिक जांच की आवश्यकता की ओर ले जाता है। जब भवन निर्माण अनुज्ञाएं निरस्त की जा चुकी हैं और भूमि की स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं, तो संबंधित विभागों के बीच समन्वय और स्पष्ट निर्णय की जरूरत है। केवल आवेदन को एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास भेजने से मामला समाप्त नहीं होगा। अंतिम निर्णय कब होगा और तब तक संबंधित स्थलों की स्थिति क्या रहेगी, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
स्थानीय लोगों का कहना हैं कि यदि भूमि निजी है, तो संबंधित पक्ष को अपने वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। यदि सरकारी या संस्थागत भूमि का मामला है, तो सक्षम विभाग को उसकी सीमा और स्वामित्व की पुष्टि करनी होगी। किसी भी स्थिति में केवल दावे के आधार पर भूमि को अवैध प्लॉटिंग की सूची से हटाना या निर्माण को वैध मान लेना उचित नहीं होगा।
अब सवाल यह है कि सीमांकन की प्रक्रिया कब पूरी होगी ? राजस्व विभाग से रिपोर्ट मिलने के बाद नगर पालिका क्या निर्णय लेगी ? और तब तक भवन निर्माण अनुज्ञाओं के निरस्तीकरण से संबंधित नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है ? अवैध निर्माण कब रुकेगा ?
6000 वर्गफीट का मामला, लेकिन जवाबदेही किसकी ?
दो अलग-अलग भूखंडों के कुल 6000 वर्गफीट रकबे से जुड़ा यह मामला नगर पालिका की भवन अनुज्ञा प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था की समीक्षा की मांग करता है। भवन निर्माण की अनुमति जारी करना, शर्तों का पालन सुनिश्चित करना और उल्लंघन की स्थिति में नियमानुसार कार्रवाई करना संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
ऐसे में जिला प्रशासन को दोनों प्रकरणों की फाइलों की समीक्षा करनी चाहिए। अनुमति जारी करने के आधार, निरस्तीकरण के कारण, संबंधित पक्ष के पुनः आवेदन और अब तक की गई कार्रवाई की जांच होनी चाहिए। यदि जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है, तो नियमानुसार जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
जिला प्रशासन से सवाल—फाइलों में कार्रवाई या मौके पर भी निगरानी…?
नगर पालिका परिषद के दस्तावेजों में दो भवन निर्माण अनुज्ञाओं का निरस्तीकरण दर्ज है, जबकि सीएमओ के अनुसार संबंधित पक्ष का पुनः आवेदन उच्च राजस्व (एसडीएम) अधिकारी के पास भेजा जा चुका है। ऐसे में जिला प्रशासन को पूरे मामले की समयबद्ध समीक्षा कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
जबकि 2025 में एसडीएम मुंगेली ने नगर पालिका को जो अवैध प्लाटिंग की सूची भेजी उसमें वह खसरा भी उल्लेख हैं जिसमें यह अवैध निर्माण जारी हैं।
पूरे मामले नागरिकों ने कहा कि वृहद स्तर पर अवैध निर्माण किया जा रहा, जिसे नगर पालिका का संरक्षण प्राप्त है ऐसे में जिले के कलेक्टर को तत्काल संज्ञान लेकर अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए कार्यवाही की पहल करनी चाहिए और दोषी अधिकारियों पर त्वरित कार्यवाही करनी चाहिये।


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