मुंगेली में सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप, ₹5,800 की रसीद से नजूल भूमि दर्ज कराने का मामला गरमाया
खसरा नंबर 370 को लेकर उठे सवाल; गरीबों के छज्जे पर कार्रवाई और बड़े निर्माणों पर कथित चुप्पी को लेकर नगर पालिका पर पक्षपात के आरोप
मुंगेली, 6 सितंबर 2026। प्रदेश में सुशासन और पारदर्शिता के दावों के बीच मुंगेली नगर पालिका क्षेत्र में शासकीय और नजूल भूमि के उपयोग तथा रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि शहर की बेशकीमती सरकारी जमीनों पर कब्जे के मामलों में नगर पालिका की कार्रवाई समान रूप से नहीं हो रही है। इसी कड़ी में खसरा नंबर 370 की नजूल भूमि पर महज 5,800 रुपये की समेकित कर रसीद काटे जाने का मामला सामने आने का दावा किया जा रहा है।
आरोप है कि जिस जमीन की वर्तमान बाजार कीमत करोड़ों रुपये बताई जा रही है, उसके संबंध में नगर पालिका की पुरानी रसीद बुक के माध्यम से कर वसूली दर्शाई गई। इसको लेकर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर किस आधार पर शासकीय नजूल भूमि से संबंधित कर रसीद जारी की गई और रिकॉर्ड में इसकी प्रविष्टि किस प्रक्रिया के तहत की गई।
टैक्स रसीद से कैसे मिलेगा जमीन पर मालिकाना हक?
मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नगर पालिका की ओर से जारी समेकित कर या संपत्ति कर की रसीद किसी व्यक्ति को शासकीय अथवा नजूल भूमि का मालिकाना हक प्रदान कर सकती है।
जानकारों के अनुसार केवल टैक्स जमा करने या उसकी रसीद प्राप्त होने से किसी भूमि पर स्वामित्व अधिकार स्वत: स्थापित नहीं होता। भूमि के स्वामित्व या वैध कब्जे से संबंधित अधिकार के लिए राजस्व एवं नजूल रिकॉर्ड, वैध नामांतरण आदेश, पंजीकृत दस्तावेज और सक्षम प्राधिकारी के आदेश जैसे अभिलेख महत्वपूर्ण होते हैं।
ऐसे में खसरा नंबर 370 से संबंधित रसीद किस आधार पर काटी गई, इसके पीछे कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए और नगर पालिका रिकॉर्ड में किस अधिकारी के आदेश से प्रविष्टि हुई, इसकी जांच की मांग उठ रही है।
नामांतरण प्रक्रिया को दरकिनार करने का आरोप
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि नजूल भूमि से संबंधित मामले में विधिवत नामांतरण प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम निकाय के रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना था तो संबंधित दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकारी के आदेश की जांच के साथ निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था।
मामले में सार्वजनिक सूचना, दावा-आपत्ति और संबंधित राजस्व रिकॉर्ड की जांच की गई या नहीं, यह भी जांच का विषय बताया जा रहा है।
पुरानी रसीद बुक से बैकडेट एंट्री का भी उठ रहा सवाल
मामले को लेकर एक और गंभीर आरोप यह है कि वर्ष 1997-98 की पुरानी रसीद बुक में हाथ से 2024-25 अंकित कर कर वसूली दर्शाई गई। यदि ऐसा किया गया है तो इसकी वैधता और रसीद जारी करने की परिस्थितियों की जांच आवश्यक होगी।
स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि संबंधित मूल रसीद बुक, टैक्स पंजी, संपत्ति पंजी, नजूल रिकॉर्ड और नगर पालिका की फाइलों का मिलान कराया जाए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि रसीद कब, किसके नाम और किस आधार पर जारी हुई।
छोटे निर्माण पर कार्रवाई, बड़े निर्माणों पर सवाल
नगर पालिका की कार्यप्रणाली को लेकर नागरिकों ने कथित दोहरे रवैये का आरोप भी लगाया है। उनका कहना है कि आम नागरिक द्वारा घर के सामने छोटा छज्जा, ओटला या अन्य निर्माण किए जाने पर नगर पालिका का अमला तत्काल कार्रवाई करता है।
वहीं दूसरी ओर मुख्य सड़कों और कथित शासकीय जमीनों से लगी जगहों पर बड़े निर्माण खड़े होने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। नागरिकों का सवाल है कि यदि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है तो कार्रवाई सभी के खिलाफ समान रूप से क्यों नहीं की जा रही।
किसकी अनुमति से हो रहे कब्जे?
शहर में नजूल भूमि, नालों और प्रमुख मार्गों से लगी जमीनों पर कथित कब्जों को लेकर भी जांच की मांग की जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकारी जमीन पर लंबे समय से कब्जे हो रहे हैं तो नगर पालिका और राजस्व विभाग के संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
SIT जांच और रिकॉर्ड ऑडिट की मांग
स्थानीय नागरिकों और कुछ पार्षदों ने मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगों में—
– खसरा नंबर 370 सहित प्रमुख नजूल जमीनों के रिकॉर्ड की जांच।
– नगर पालिका के नामांतरण एवं टैक्स पंजी का विशेष ऑडिट।
– पुरानी रसीद बुकों और संबंधित कर रसीदों की जांच।
– बिना वैध आदेश के की गई किसी भी प्रविष्टि की समीक्षा।
– नगर पालिका और राजस्व रिकॉर्ड का आपस में मिलान।
– शासकीय जमीन पर हुए कथित कब्जों का सीमांकन।
– जांच में अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों पर नियमानुसार कार्रवाई।
शिकायतकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि यदि जांच में दस्तावेजों में कूटरचना, गलत प्रविष्टि या अन्य आपराधिक अनियमितता प्रमाणित होती है तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जाए।
जांच के बाद ही साफ होगी वास्तविक स्थिति
खसरा नंबर 370 की जमीन, ₹5,800 की कर रसीद, कथित नामांतरण और पुरानी रसीद बुक में वर्ष बदलकर प्रविष्टि किए जाने के आरोपों की आधिकारिक जांच होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई है या नहीं। फिलहाल मामला जांच और प्रशासनिक कार्रवाई की मांग के केंद्र में है।

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