मुंगेली में भव्य एवं गरिमामय जिला स्तरीय संस्कृत संगोष्ठी: संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन पर हुआ व्यापक विचार-विमर्श
संस्कृत भाषा के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध साहित्यिक परंपरा, भारतीय ज्ञान-विज्ञान एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा विद्यालयी शिक्षा में संस्कृत विषय के प्रभावी क्रियान्वयन को
प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आज दिनांक 04 नवम्बर 2026 को जिला मुंगेली में संस्कृत व्याख्याताओं की जिला स्तरीय संगोष्ठी का भव्य एवं गरिमामय आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक आयोजन में आध्यात्मिक जगत के पूज्य संत, संस्कृत के विद्वान, छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामण्डल के प्रतिनिधि, जिला शिक्षा विभाग के अधिकारी तथा जिले के संस्कृत व्याख्याताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में परमपूज्य श्रीचक्र महामेरु पीठाधिपतिः, अनन्तश्री विभूषितः परमपूज्य गुरुदेव श्रीश्री सच्चिदानन्द तीर्थ महास्वामी जी महाराज का पावन सान्निध्य एवं माँ सरस्वती वैदिक मंगलाचरण मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामण्डल, रायपुर के अध्यक्ष राजेश कुमार राजपूत की गरिमामयी उपस्थिति रही। जिला शिक्षा विभाग की ओर जिला शिक्षा अधिकारी डॉ मोहन लाल पटेल जी
एस एमसी अशोक सोनी
के निर्देशन से ए.पी.सी. तीरथ प्रसाद बड़गैयाँ, लेखराम साहू एवं प्रदीप उपाध्याय , स्वामी आत्मानंद द्वाऊपारा के प्राचार्य लीला श्रीवास्तव एवं जनप्रतिनिधि अरविंद राजपूत, नर्मदा सिंह राजपूत, पीतांबर सिंह ठाकुर, विनोद सिंह राजपूत, अखिलेश्वर राजपूत जी विशेष रूप से उपस्थित रहे। संगोष्ठी में जिले के समस्त संस्कृत व्याख्याताओं ने सहभागिता करते हुए संस्कृत शिक्षण की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों एवं संभावनाओं पर अपने विचार साझा किए।
संस्कृत भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा की आधारशिला
संगोष्ठी में संस्कृत भाषा की सार्वकालिक प्रासंगिकता, भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के विकास में इसके योगदान तथा वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, दर्शन, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, गणित एवं विविध शास्त्रीय ज्ञान परंपराओं में संस्कृत की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श किया गया। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, अपितु भारत की ज्ञान परंपरा, वैज्ञानिक चिंतन, नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिक चेतना एवं सांस्कृतिक एकता की सशक्त संवाहक है।
संस्कृत भाषा में निहित मानवीय मूल्यों, सदाचार, अनुशासन, कर्तव्यबोध, सहिष्णुता एवं विश्वबंधुत्व की भावना को विद्यार्थियों तक पहुँचाना वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। संस्कृत के अध्ययन से विद्यार्थियों में भाषा संबंधी दक्षता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।
गुरुदेव के पावन सान्निध्य में संस्कृत शिक्षकों को मिला मार्गदर्शन
मुख्य अतिथि परमपूज्य गुरुदेव श्रीश्री सच्चिदानन्द तीर्थ महास्वामी जी महाराज के पावन सान्निध्य एवं मार्गदर्शन से संगोष्ठी का वातावरण आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक चेतना से परिपूर्ण रहा। उनके मार्गदर्शन ने संस्कृत भाषा के अध्ययन-अध्यापन को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर उसे जीवन व्यवहार, संस्कार एवं भारतीय संस्कृति से जोड़ने की प्रेरणा प्रदान की। उपस्थित शिक्षकों ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार को सामाजिक एवं शैक्षणिक दायित्व के रूप में ग्रहण करने का संकल्प व्यक्त किया।
संस्कृत विद्यामण्डल के अध्यक्ष ने रखे महत्वपूर्ण विचार
विशिष्ट अतिथि छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामण्डल, रायपुर के अध्यक्ष राजेश कुमार राजपूत ने संस्कृत शिक्षा के विकास, विद्यालयों में संस्कृत विषय की उपयोगिता, संस्कृत शिक्षकों की भूमिका तथा विद्यार्थियों में संस्कृत के प्रति रुचि विकसित करने के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने संस्कृत विषय को अधिक प्रभावशाली एवं व्यवहारपरक बनाने, शिक्षण की नवीन तकनीकों को अपनाने तथा विद्यार्थियों को संस्कृत संभाषण के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने संस्कृत शिक्षकों को अपने विषय के प्रति पूर्ण निष्ठा, समर्पण एवं सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही संस्कृत भाषा को जनसामान्य एवं नई पीढ़ी तक पहुँचाने में शिक्षकों की भूमिका को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया।
शिक्षण की नवीन विधियों एवं संस्कृत संभाषण पर विशेष चर्चा
संस्कृत गीत पर बच्चो की प्रस्तुति बहुत ही सुन्दर रही, राधा सोनी, अंजलि मानिकपुरी, सुधा कोशले, राधा जोशी, काव्या, गायत्री, सुधा पटेल, दीक्षा बंजारे।
संगोष्ठी में संस्कृत शिक्षण को सरल, रुचिकर, संवादात्मक एवं परिणाममूलक बनाने के लिए विभिन्न शैक्षणिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेष रूप से निम्न विषयों को प्रमुखता दी गई—
विद्यालयों में संस्कृत विषय के प्रभावी शिक्षण एवं अध्ययन-अध्यापन की गुणवत्ता में वृद्धि।
विद्यार्थियों में संस्कृत भाषा के प्रति रुचि, जिज्ञासा एवं आत्मविश्वास विकसित करना।
संस्कृत संभाषण एवं दैनिक जीवन में सरल संस्कृत वाक्यों के प्रयोग को प्रोत्साहित करना।
संस्कृत श्लोक, सुभाषित, सूक्तियों एवं नैतिक प्रसंगों के माध्यम से विद्यार्थियों में संस्कारों का विकास।
शिक्षण में चार्ट, मॉडल, गतिविधि आधारित शिक्षण एवं डिजिटल शैक्षणिक संसाधनों का उपयोग।
संस्कृत गीत, नाटक, भाषण, प्रश्नोत्तरी एवं प्रतियोगिताओं का आयोजन।
संस्कृत साहित्य, भारतीय दर्शन एवं प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की परंपरा से विद्यार्थियों को परिचित कराना।
संस्कृत व्याख्याताओं के मध्य शैक्षणिक अनुभवों, नवाचारों एवं शिक्षण विधियों का नियमित आदान-प्रदान।
वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि संस्कृत को केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने का विषय न मानकर जीवन मूल्यों, संस्कारों एवं ज्ञान अर्जन का माध्यम बनाया जाना चाहिए।
विद्यालयों में संस्कृत के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता
संगोष्ठी में इस बात पर भी विचार किया गया कि विद्यालय स्तर पर संस्कृत शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने के लिए शिक्षकों को योजनाबद्ध तरीके से कार्य करना होगा। प्रत्येक विद्यालय में संस्कृत संबंधी गतिविधियों, संस्कृत संभाषण, श्लोक पाठ, सुभाषित वाचन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
संस्कृत शिक्षकों को विद्यार्थियों की आयु एवं शैक्षणिक स्तर के अनुरूप सरल भाषा, रोचक उदाहरण तथा गतिविधि आधारित शिक्षण पद्धति अपनाने की प्रेरणा दी गई। इससे विद्यार्थियों में संस्कृत के प्रति भय समाप्त होगा तथा भाषा के प्रति सहज लगाव उत्पन्न होगा।
जिले में संस्कृत शिक्षा के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
डॉ रामबाबू मिश्र के द्वारा यह जिला स्तरीय संगोष्ठी केवल विचार-विमर्श का कार्यक्रम न होकर जिले में संस्कृत शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, संस्कृत व्याख्याताओं को एक साझा शैक्षणिक मंच प्रदान करने तथा संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सामूहिक प्रयासों को गति देने की एक महत्त्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई।
कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि संस्कृत भाषा का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब इसे विद्यालयों, विद्यार्थियों, परिवारों एवं समाज के दैनिक जीवन से जोड़ा जाए। इसके लिए संस्कृत के शिक्षक, शिक्षा विभाग एवं संस्कृत से जुड़े सभी संस्थानों को समन्वित प्रयास करने होंगे।
आभार एवं धन्यवाद ज्ञापन
कार्यक्रम के अंत में ए.पी.सी. प्रदीप उपाध्याय जी ने परमपूज्य गुरुदेव, माननीय अध्यक्ष छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामण्डल, जिला शिक्षा विभाग के अधिकारियों तथा जिले के समस्त संस्कृत व्याख्याताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने संगोष्ठी को सफल एवं सार्थक बनाने में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग प्रदान करने वाले सभी लोगों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर उपस्थित संस्कृत व्याख्याताओं ने संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रभावी शिक्षण के लिए पूर्ण निष्ठा, समर्पण एवं सामूहिक सहभागिता के साथ कार्य करने की भावना व्यक्त की।
निश्चित रूप से जिला मुंगेली में आयोजित यह संस्कृत संगोष्ठी संस्कृत शिक्षा के विकास, शैक्षणिक नवाचार एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रसार की दिशा में एक प्रेरणादायी कदम सिद्ध होगी।
संस्कृतं वदतु भारतम्।
संस्कृतं जयतु भारतम्।
जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम्।
डॉ. रामबाबू मिश्र
संस्कृत व्याख्याता
जिला मुंगेली, छत्तीसगढ़।




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